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Tuesday, 7 February 2017

Hand Block Printing Techniques

Every craft has its own story to tell. In this blog post we are giving the glimpse of the different hand block printing techniques. 

Mainly three types of hand printing or hand block printing techniques used in printing natural colors on fabrics are:


1. Direct or mordant printing or Alizarin printing (Bagh, Bagru, Tarapur)


2. Resist printing such as Dabu (Akola, Bagru, Kaladera, Tarapur, Udaipur)


3. Combination of Direct & Resist Printing (Ajrakh, Balotra, Nandana & Taarapur)



Chippa community of Tarapur, Madhya Pradesh and Balotara, Rajasthan have developed their own technique by combining alizarin and resist printing techniques. In Tarapur this technique has been developed by Late Shri Purushottam Jhariya and his family. Presently EcoFab is working with his family to evolve different design pattern and shades of natural dyes.

In this blog post we are discussing about direct or mordant printing. Rest of the printing techniques will be discussed in next blog posts.

#Direct or Mordant Printing



The widely used direct or mordant hand block printing technique is also known as Alizarin printing. Alizarin is a natural chemical which is extracted from the roots of Madder(Rubia cordifolia) & bark of Al root (Morinda Citrifolia) used to get natural Red color where alum has been printed and to fix the Black (Jaggery powder & iron rust) color. Today this natural alizarin is replaced by synthetic alizarin.

It is also known as mordant printing because of use of mordants such as Harad (Myrobalan) powder and Fitkari (Alum) in the process.

In Indian traditional hand block printing industry natural Alizarin was extracted from roots of Al tree (Morinda Citrifolia) commonly known as "Al Tree". Alizarin was the first natural pigment which was made synthetically in the lab in the year 1868. In India it got popularized some 50 years ago since then not a single hand block printing cluster using natural Al roots to get the red color. 


Even present generation of hand block printers not only forgot the use of Al roots but also the process. With the arduous efforts and research EcoFab team came to know that today it is used by tribes of Kotpad region of Orissa to dye the motifs of their handloom Sarees and fabrics.


Easy to use and cost effectiveness of synthetic alizarin made it popular among the hand block printers community in India so it has replaced the use of Al roots to get red color. 


In this direct printing or alizarin printing only two colors red and natural black can be printed. 

1. Bagh print (Dhar, Madhyapradesh)
2. Bagru print (Bagru, Rajasthan)
3. Bherogarh print (Ujjain, Madhyapradesh): Now a hub of batik printing.
4. Kukshi (Dhar, Madhyapradesh)  
5. Kutchh (Kutchh, Gujarat)
6. Tarapur (Javad, Madhyapradesh)
7. Sanganer (SanganerRajasthan). Now a hub for chemical printing


In many other places of Rajasthan and Gujarat Alizarin printing is also practiced apart from Dabu and Ajrakh printing.


हस्त छपाई या ठप्पा छपाई के प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके कपड़ो पर छपाई करने के मुख्यतः तीन प्रकार हैं:


1. सीधे छपाई (अलिज़रिन प्रिंटिंग)
२. बाधा छपाई (दाबू, अजरख)
३. उपरोक्त दोनों छपाई का संगम


सीधे छपाई और बाधा छपाई की तकनीको को मिलाकर एक नयी तकनीक मुख्यतः तारापुर, मध्यप्रदेश और बालोतरा, राजस्थान के छिप्पा समाज द्वारा विकसित की गयी हैं| तारापुर, मध्यप्रदेश में यह तकनीक छिप्पा समाज के स्वर्गीय पुरुषोत्तम झरिया जी द्वारा विकसित की गई|

इस ब्लॉग पोस्ट में हम केवल मोरडेंट या सीधी छपाई की बात करेंगे| बाकी की छपाई तकनीको को हम दुसरे ब्लॉग पोस्ट में लिखेंगे|


#
सीधीछपाई

सीधे छपाई की सबसे प्रचलित तकनीक को अलिज़रिन प्रिंटिंग के नाम से भी जाना जाता हैं| अलिज़रिन मुख्यतः मंजिष्ठ (रुबिया कोर्दिफोलिया) की जड़ से निकलने वाला लाल रंग का प्राकृतिक केमिकल हैं| भारत में आल (मोरिंडा सिट्रीफोलिया) की जड़ का उपयोग प्राकृतिक अलिज़रिन को प्राप्त करने के लिए किया जाता था| जिसका उपयोग छपाई में उपयुक्त होने वाले दो प्राकृतिक रंगों फिटकरी की छपाई पर लाल और काले (गुड़ और लोहे की जंग) रंग को पक्का करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है

यह मोरडेंट छपाई भी कहलाती हैं| मोरडेंट यानी की रंगाई करने के पहले किसी दुसरे पदार्थ से आधार तैय्यार करना| इस तरह की छपाई में हरडा पाउडर और फिटकरी का प्रयोग किया जाता हैं| 

पहली बार १८६८ में अलिज़रिन को कृत्रिम रूप से लैब में तैयार किया गया जिसके बाद से प्राकृतिक अलिज़रिन की मांग में कमी चली आती गयी| भारत में पिछले ५० सालो से कृत्रिम अलिज़रिन का उपयोग ठप्पा छपाई में धड़ल्ले से शुरू हो गया हैं जिसके कारण परंपरागत ब्लाक प्रिंटर्स आल की जड़ से प्राकृतिक अलिज़रिन के उपयोग की विधि भूल गए हैं क्यूंकि उसकी प्रक्रिया न केवल जटिल हैं बल्कि महँगी भी हैं| एकोफेब की टीम ने गहन अध्ययन के बाद पता किया की आल की जड़ का उपयोग आज केवल उड़ीसा के कोटपड़ इलाके के आदिवासी हथकरघा साड़ियो में बनायीं गयी डिजाईन को रंगने में करते हैं|

भारत में आज परंपरागत सीधी ठप्पा छपाई में केवल प्राकृतिक काले रंग का ही उपयोग हो रहा हैं| लाल रंग की डिजाईन को प्राप्त करने के लिए कृत्रिम अलिज़रिन का उपयोग किया जाने लगा हैं|

भारत में छिप्पा या खत्री समाज द्वारा अलिज़रिन प्रिंट तकनीक का उपयोग करने वाले मुख्य स्थान थे और जहाँ आज भी किसी न किसी रूप में यह तकनीक जीवित हैं:


१. बाघ प्रिंट (धार, मध्यप्रदेश)
२. बगरू प्रिंट (बगरू, राजस्थान)
३. भेरोगढ़ (उज्जैन, मध्यप्रदेश) अब यह बटिक प्रिंटिंग के लिए जाना जाता हैं|
४. कुक्षी (धार, मध्यप्रदेश)
५. सांगानेर (सांगानेर, राजस्थान) अब केमिकल प्रिंटिंग का गढ़ हैं|
६. कच्छ (कच्छ, गुजरात)
७. तारापुर (जावद, मध्यप्रदेश)


राजस्थान और गुजरात के कई स्थानों में मुख्यतः दाबू और अजरख के आलावा अलिज़रिन प्रिंटिंग का भी उपयोग किया जाता हैं|


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